लेखनी कहानी -03-Jul-2023# तुम्हें आना ही था (भाग:-13)# कहानीकार प्रतियोगिता के लिए
गतांक से आगे:-
आज परी बड़ी ही खुश नजर आ रही थी ।ऐसे लग रहा था जैसे उसे वो मिल गया था जिसे वो ढूंढ रही थी ।खाना खाकर वह अपनी मां से बोली,"मां मैं स्वीटी के घर जा रही हूं ।उसके बापू उसके लिए शहर से बड़े अच्छे कपड़े लायें है वो मुझे बता रही थी और कह रही थी कि तुम देखने आ जाना। क्या मैं जाऊं?"
काफी दिनों बाद बेटी को इतना खुश देखकर चम्पा भी उसे मना नहीं कर पाई और उसे उसकी सहेली के यहां भेज दिया।बचपन से ही परी को जब भी वो सपना आता था जिसमें कोई नकाबपोश उसके पीछे खंजर लेकर दौड़ रहा है और वह बेहताशा भागी जा रही है ।वह जब भी ये सपना देखती तो डर के मारे चीखते हुए उठती और उसके बाद महीना भर उसे ज्वर नहीं उतरता था ।जैसे कोई राज है उसके अंदर जिसका उसे भी नहीं पता । लेकिन कल से जब से उसके बापू उसे महल के खंडहर से लेकर आये है तब से बड़ी ही खुश नजर आ रही थी ।पहले भी दो तीन दफा ऐसा हो चुका था उसके साथ लेकिन जब भी वापस आती दुःखी थकी हुई और निराश ही वापस आती ।ऐसे लग रहा था जैसे वो किसी को तलाश रही है।
******"*********
इधर राज, शास्त्री जी और मिस्टर प्रसाद उस संदूकची में रखी किताब जो शायद किसी ने रोजमर्रा की बातों के लिए लिखा होगा के विषय में बात कर रहे थे ।तभी शास्त्री जी को वो संदूकची देखकर ऊपरी हवा का ज्ञान हुआ। उन्होंने आंखें बंद करके संदूकची पर हाथ रखा तो ऐसे लगा जैसे एक बहुत ही सुन्दर नर्तकी उसके सामने बैठी है और वो अपनी आप बीती बताना चाहती है ।
प्रत्यक्ष में तो शास्त्री जी उस किताब को खोलकर राज और मिस्टर भूषण प्रसाद को पढ़कर बता रहे थे लेकिन वास्तव में वो सामने बैठकर अपनी आपबीती बता रही थी।…………..
कुंदनपुर राज्य के ऊपर प्रकृति की अनुपम कृपा थी ।वह राज्य चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ था ।झरने , पेड़ पौधे फूलों के, चारों और बिखरे पड़े थे । मनमोहक प्राकृतिक छटा बिखेरी रहती थी कुंदनपुर में । वहां के राजा वीरभान के कोई औलाद नही थी विवाह को अर्सा हो गया था लेकिन रानी की गोद अभी भी सूनी थी ।जिसका ये परिणाम हुआ कि राजा अय्याशी में पड़ गया दिन रात मदिरा का सेवन करता और सारा दिन रंग महल में पड़ा रहता ।उस समय उसके रंग महल में सुदूर प्रदेश से एक नर्तकी कनकबाई आई थी बड़ा ही सुन्दर नृत्य करती थी । नजरों ही नज़रों में सामने वाले का जिगर हथेली पर लाकर रख देती थी ।महल में उसके बहुत से दीवाने थे लेकिन एक दिन राजा जी की नजरों में आ जाने के बाद वो बड़ी खास हो गयी थी रंगमहल में ,राजा वीरभान उस पर जान छिड़कता था ।उसे जब भी मुजरा सुनना होता था तो कनक बाई उसे चाहिए ही चाहिए।
एक दिन कनक बाई ने यूं ही मज़ाक में कह दिया,
" महाराज आप मुझे अपना समझते हैंऔर रंग महल में रखते हैं । यहां सत्तर तरह के लोग आते हैं जो मुझे बड़ी ही अजीब नज़रों से देखते हैं । क्या आप अपनी कनक को यूं सब की नजरों में खटकाते रहेंगे?"
बस कनक बाईं का इतना कहना था कि राजा वीरभान ने उसी समय लाल हवेली का निर्माण शुरू करवा दिया और महज तीन मास में हवेली बनकर तैयार हो गयी ।बड़ी ही सुंदर निर्माण करवाया था राजा वीरभान ने हवेली का और एक एक चीज बड़े बड़े राज्यों से मंगवाई थी ।साथ सज्जा ऐसी की देखने वाले का मुंह खुला का खुला रह जाए।राजा वीरभान ने उस हवेली में बहुत से ऐसे गुप्त रास्ते बनवाये थे जिससे हवेली में महल से कभी भी आ जा सकते थे । क्यों कि राजा वीरभान को ना जाने कब कनक बाई से मिलने का मन हो जाए ।तो वो इन्हीं गुप्त रास्तों से "लाल हवेली" में आया करते थे ।
कनक बाई की एक बेटी थी "चंद्रिका" बड़ी ही सुंदर। मात्र चार साल की थी लेकिन ऐसे लगती थी जैसे कोई अप्सरा उतर आई हो धरती पर।कनक बाई ने उसे बचपन से ही नृत्य की शिक्षा देना शुरू कर दिया था और अक्सर ही कहती थी "नाचने वाली की बेटी नाचने वाली ही बनेगी । अच्छा है जितनी जल्दी ये नाचना सीखेगी उतनी ही अच्छी नृत्यांगना बनेगी।"
पर चंद्रिका को ये नाच गाना कभी रास नहीं आता था ।वह भी एक औरत की तरह घर बसाकर बच्चे पैदा करना चाहती थी क्योंकि उसने बचपन से ही अपने लिए "हरामी "शब्द सुना था ।पहले तो समझ नहीं थी कि हरामी क्या होता है ? एक दिन उसे किसी ने हरामी कहा तो उसने पलटकर पूछ ही लिया ,"आप मुझे हरामी कहा रहे हैं इसका मतलब तो समझा दो।"
तभी सामने से आवाज आई "जिसके बाप का पता नहीं होता वो हरामी होता है ।"
बस उस दिन से चंद्रिका ने मन में ठान लिया था कि वो विवाह करेगी और उसके बच्चों के बाप का नाम होगा।
इधर राजा वीरभान सारा दिन मदिरा के नशे में पड़ा रहता था महिना भर वो रानी का चेहरा नहीं देखता था तभी महल के सेनापति से रानी की आंखें चार हो गई और शीघ्र ही रानी गर्भवती हो गई।
जब ये बात राजा वीरभान को पता चली तो उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ और वे नशे में लड़खड़ाते हुए महल में पहुंचे और सीधा रानी के कक्ष में आये और आकर बोले,
"रानी मैं अचंभित हूं कि इतने वर्षों बाद भगवान ने हमारी सुन ली ।नहीं तो हम निरवंशी ही मर जाते ।"
रानी ने भी कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा," जी महाराज ।ये तो भगवान की असीम कृपा हुई है "
अंदर से राजा वीरभान भी जानते थे कि वो कभी पिता नहीं बन सकते थे लेकिन परिवार की इज्जत बची रहे इसलिए वे चुप रहे और साथ ही उनकी कमज़ोरी किसी को पता नहीं चले वो यही चाहते थे
पर उस दिन के बाद से वो कभी भी रानी के कक्ष में नहीं गये ।इधर रानी भी तो यही चाहती थी कि वो अपने प्रेमी की बाहों में रहें।
धीरे-धीरे समय व्यतीत होने लगा और प्रसव का समय भी नजदीक आ रहा था।
कहानी अभी जारी है…………..
KALPANA SINHA
12-Aug-2023 07:17 AM
Nice part
Reply